दो पल – अतीत के (हौसला)


यह बात करीब 1970 की है, मैं अपनी ठोडी को दोनो हथेलियों पर टिकायें और दोनो कोहनियों को मेज पर रखे अचेतनता की उन्मीलित मुद्रा में कक्षा में बैठा था। मनोविज्ञान का घण्टा था मास्टर जी मनोविज्ञान पढ़ा रहे थे परन्तु न तो मेरे कान उनकी आवाज को सुन रहे थे और न ही आँख उनकी आकृति को ही देख रही थी मैं उद्विग्न मन से औरो से अपनी पीड़ा छिपाये बैठा था कक्षा दस, 12 और बी0एस0सी0 तो ट्यूशन पढ़ा-पढ़ा कर सभी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर ली थी परन्तु अब बी0एड0 के लिए मुझे कोई चारा नही दिखायी दे रहा था। मेरा मन और मस्तिष्क बैचेन थे। मेरे परिवारीजन मेरी इस प्रतिभा को देखकर मन नही मन कुढ़ते थे शत्रुता प्रतिभा की संगिनी होती है मेरे ताऊ और चाचा जी के लडके कक्षा दस में कई बार फेल हो गये थे जो मुझसे कई कक्षा आगे थे। उनके फेल होने से मै उनके साथ आ गया और उनके पुनः फेल होने से मैं उनसे और आगे निकल गया। यही उनके जलने का कारण था। मेरे घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नही थी परन्तु मैं अपनी उम्र के छात्रों और उनसे भी अधिक उम्र के छात्रों को ट्यूशन पढ़ा-पढ़ा कर बी0एस0सी0 कर चूका था।किसी के आने से कक्षा के सभी छात्र खडे हो गये मेरी अचेतनता का विश्रंृखलित हो गयी मैं भी खडा हो गया देखा- कि वे स्केूल के प्राधानाचार्य जी है। उन्होनें छात्रों को अपनी सीट पर बैठने का संकेत दिया। सभी छात्र अपनी-अपनी सीटों पर बैठ गये। प्रधानाचार्य जी बोले इस बी0एड0 की कक्षा में कोई ऐसा बच्चा है जो हमारे स्कूल के कक्षा-दस के छात्रों को गणित पढ़ा सकें। यदि कोई ऐसा हो तो अपनी जगह पर खडा हो जाये। मैने दाँयें बाँये और पीछे घूमकर देखा कोई भी खडा नही हुआ। प्रधानाचार्य कुछ निराश हो गये। फिर से बोले- इन 100 बच्चों में एक भी ऐसा नही है जो हमारे कक्षा-दस के छात्रों को गणित पढा सकें। मै सही अवसर देखकर खडा हो गया। प्रधानाचार्य बोले- ‘‘बेटे क्या पहले कभी कक्षा-दस का गणित पढ़ाया है? मैने उत्तर दिया- जी हाँ… पढ़ा पढ़ा कर ही तो मैं यहां तक आया हूँ।’’ प्रधानाचार्य ने मुझे कक्षा से बाहर आने का संकेत दिया। मैं बाहर आ गया। कक्षा के बाहर प्रधानाचार्य मुझे एक पेड़ की छाया में ले गये बोले- ‘‘बेटे! जो अध्यापक गणित पढ़ाते थे वे बहुत अच्छा पढ़ाते थे और बैंक मैनेजर होकर चले गये। सत्र के बीच में अध्याचन भेजने पर नया अध्यापक जल्दी आयेगा नही, बच्चे मारे-मारे भटक रहे है। मैं क्या करू? और कोई चारा नही है यदि तुम इस सत्र में कक्षा दस के बच्चों को गणित पढ़ा दो तो बच्चों का परीक्षाफल अधिक खराब न होगा।’’ मैने पढ़ाने के लिए स्वीकृति तो दे दी परन्तु मेरे साथ एक समस्या थी कि मेरा तो दाखिला भी उस विद्यालय में नही हुआ था। मैने प्रधानाचार्य से कहा- ‘‘साहब मेरा तो स्कूल में अभी दाखिला भी नही हुआ है।’’ प्रधानाचार्य दंग रह गये बोले- ‘‘फिर कक्षा में क्यों बैठे हो? आज मैं पहली बार कक्षा में आया हूँ’’ – मैने कहा। फिर दाखिला क्यों नही लिया? ‘‘दाखिला और पुस्तकों की व्यवस्था के लिए बहुत लोगों से रूपये लेने के लिए अभ्र्यथना की पर असफल रहा।’’ प्रधानाचार्य विचारो की उधेडबुन में पड गये। मैं सिर झुकाये खडा रहा। कुछ क्षण रूककर प्रधानाचार्य बोले- ‘‘यदि तुम हमारे बच्चों को संतुष्ट कर दोगें तो तुम्हारे दाखिला कापी किताबों और मैस का खर्चा विद्यालय वहन करेगा।’’ प्रधानाचार्य में मुझे सौम्यता शौहार्द की झलक दिखायी दी मैने साहस करके कहा। इस ड्रैस सफेद कुर्ता, टोपी, पाजामा जो मैने उसी समय एक लडके से मांग कर पहने थे, मैं तो में बच्चो को संतुष्ट नही कर पाऊँगा। क्यों? क्या इन कपडो में पढ़ाने की कला कुठित हो जायेगी? मैने कहा- नही साहब ऐसी बात नही है बच्चे मुझे ट्रेनिंग करने वाला लडका समझेगें जिससे अनुशासन बनाना मुश्किल हो जायेगा। आप जानते ही है अनुशासन के बिना पढ़ाना बड़ा मुश्किल है। प्रधानाचार्य हल्के से मुस्कुरायें और स्वीकृति में सिर हिल दिया ओर कहा- कपडा पहनकर आओं दूसरा घण्टा लेना है।इण्टर कालिज और टेªनिंग कक्षाऐं एक ही प्रांगण में चलती थी। कालिज काफी बड़ा था और दोनो के प्रधानाचार्य एक ही थे। मै जूते और पेन्ट शर्ट पहनकर आफिस में गया। उन कपड़ो में मैं बहुत ही फब रहा था। ये मेरी शादी के तीन चार महीने पहले हुई थी उसके कपडे थे उन कपडों में जब ससुराल गया तो सबने कहा था लडका क्या है कोई राजकुमार है। ऐसी नजर लगी कि मै चार पांच दिन बुखार में रहा। आफिस में मुझे देखते ही प्रधानाचार्य बोले- पहला घण्टा तुम्हारा खाली है और दूसरा कक्षा- 10 ब में गणित का है। इन्टरवल तक का टाईम टेबिल लिख लो शेष इण्टरबल के बाद लिख लेना। मैने कहा लो पूरा ही टाईम टेबिल लिख लूँ- देर ही कितनी लगेगी। जैसी तुम्हारी मर्जी। उन्होने मुझे फिर से हिदायत दी कि एक बात का ध्यान रखना तुम्हारा खर्चा तभी माफ होगा जब तुम हमारे बच्चों को संतुष्ट कर पाओगें अन्यथा नही और हाँ रात को तुमको अपनी बी0एड0 की तैयारी करनी है। ऐसा न हो गणित के चक्कर में बी0एड0 में रह जाओं। कठोरतम मेहनत की आवश्यकता है। प्रधानाचार्य के बोल मेरे मस्तिष्क में गूंज रहे थे……खर्चे जब ही माफ होगा जब तुम हमारे बच्चो को संतुष्ट कर पाओगें। अचानक ही दूसरा घण्टा बज उठा। मुझे लगा कि वह हथौड़ा पीतल के गोल घण्टे पर नही बल्कि मेरे सीने पर लगा है। ऊहापोह की स्थिति में भारी कदमों से मैं कक्षा की ओर बढ़ चला जहां मेरा भविष्य सफला के द्वार खोलकर मेरा इंतजार कर रहा था। मेरे मन में यह भय भी था कि क्या मैं बच्चों को संतुष्ट कर पाऊंगा। पहले अध्यापक गणित कहां तक करवाकर गये है। और मुझे कहां से पढ़ाना है इसी अनिश्चितता के भय से आखिर मैनें अपने कदम कक्षा मे रख ही दिये। बच्चे मुझे देखते ही खडे़ हो गये। मैनें बडे प्यार से उन्हे बैठने का इशारा किया। बच्चे बैठ गये। वे मुझे नया अध्यापक ही समझ रहे थे। एक लडका खड़ा हुआ और बोला- मास्साब……… इस पांचवे प्रश्न को समझा दो मेरी फूंक खिसक गयी। यह पांचवा प्रश्न किस प्रश्नावली का है और क्या है, क्या मुझसे निकल पायेगा या नही। परन्तु मुझको अपने पर पूरा भरोसा भी था मैने प्यार से पूछा-भैईया किस पेज पर है ओर कौन सी प्रश्नावली का है? उसने मुझे पेज और प्रश्नावली बताई। मैने देखा कि वह प्रश्न शंकु का आयतन और सम्पूर्ण पृष्ठ का है जिसको निकालना मेरे बाँये हाथ का काम था। मैने आहिस्ता आहिस्ता उस सवाल को इस तरह से समझाया कि चाहे समय कितना भी लग जाये परन्तु कमजोर से कमजोर बच्चे की भी समझ में आ जायें। सुलेख मेरा अच्छा था ही तो बच्चों को समझने में भी परेशानी नही हुई मैने देखा कि कक्षा शांत चित्त होकर एकाग्र मन से सवाल समझ रही है। मेरा हौसला बढ गया कहावत है प्रथम प्रभाव अच्छा अन्त प्रभाव भी भला। मन से भय निकल गया। बच्चों ने और भी सवाल पूछे। मैने तसल्ली और प्यार से सवाल समझाये। इस तरह एक घण्टा में मैने केवल चार सवाल समझाये परन्तु समझाये इस तरह से कि एक-आध ही ऐसा लड़का हो जिसकी समझ में ना आया हो बच्चें मुझसे बडे़ प्रभावित हुये। घण्टा बजा और मैं अगली कक्षा में चला गया। वहां भी मुझे देखते ही बच्चे खडे हो गये मैनंे बैठने का संकेत किया। बच्चे अपनी सीटों पर बैठ गये। यहां भी मुझे वही भय था कि इस कक्षा में कौन सा अध्याय चल रहा है। तभी एक लडका खडा हुआ बोला- मास्साब चैथा सवाल समझा दो मैने पूछा चैथा सवाल कौन से अध्याय का है। उसने वही अध्याय बताया जिसको मैं पिछली कक्षा में समझाकर आया था। मेरी जान में जान आ गई। मैने चार पांच सवाल उस कक्षा मे भी उसी तरह से समझाये। अव मेरी हिम्मत बँध गयी थी। हमने अन्य कक्षाओं में भी उसी तनमय्ता से काम किया इन्टरवल में जब मैं स्टाफ रूप मे ंजाकर बैठा तो इंचार्ज को मेरा स्टाप रूम में बैठना अच्छा नही लगा। उसने व्यंग भाव से मुझे अपमानित करते हुये कहा- आईये! प्रोफेसर साहब!! बैठिये-कुर्सी लाऊ! मैं अपने अपमान के जहर का घूंट पीकर रह गया। मैने सोचा सफलता बाँहें फैलाये मुझे अपने आगोश में लेने के लिए बेकरार है। तो मुझे इन छोटी सी बातों पर ध्यान नही देना चाहिए। परन्तु प्रधानाचार्य के एक वफादार अध्यापक को मेरा अपमान किया जाना अच्छा नही लगा। दो तीन दिन वाद आखिर में उन्होने प्रधानाचार्य जी को सब कुछ बता दिया। वे भी उनसे नाराज हुये। अगले दिन जब में उस कक्षा-10 ब की कक्षा में गया तो बच्चे प्रसन्न मुद्रा में खडे हुये। मुझे लगा कि यह मेरा सत्कार दिखाने का भाव है। मैने बैठने के लिए कहा। बच्चे बैठ गये। उनमें से एक लड़का खडा हुआ और बोला मास्साब…… तुम्हारे कक्षा से जाने के बाद प्रिसिपल साहब आये थे। क्या कह रहे थे? वे कह रहे थे बच्चो! जो नये मास्टर जी पढ़ाने के लिए आये है वे कैसा पढ़ाते है? पहले मास्टर जी जैसा तो नही पढ़ाते होगें? मैने कहा- तुमने कहा होगा कि अच्छा नही पढ़ाते, कुछ समझ में ही नही आता। बच्चे समवेत स्वर में बोले- नही साहब हम ऐसा क्यों कहते? हमने कहा- प्रिसिपल साहब वे बहुत अच्छा पढ़ाते है, उनकी एक-एक बात सबकी समझ में आती है। उन्होने पूछा- क्या पहले मास्टर जी जैसा पढ़ा सक?ें हमने कहा- पहले मास्टर जी से तो काफी अच्छा पढ़ाते है। मैने मन ही मन प्रफुल्लित मन से कहा धत्त तेरे की झूठ क्यों बोलते हो? बच्चे बोले नही साहब आपका पढाया हुआ हमारी समझ में बहुत आया है। उसके बाद सवाल समझाने शुरू कर दिये और उत्साह से। एक-एक पाइण्ट को बारीकी से बताते हुये। एक-एक बार नही तीन-चार बार और घण्टा खत्म हो गया। पंाच दिन तक मै जिस-जिस कक्षा में गया बच्चों ने प्रिसिपल साहब के आने की वही बात बताई और साथ ही उन्होने क्या कहा यह भी बताया। अब मेरा बच्चों से प्यार और बच्चों का मुझसे प्यार और गहरा गया। प्रधानाचार्य महोदय एक दिन सुबह को जंगल में शौच से निवृŸा होकर ट्यूबैल पर हाथ मुहँ धो रहे थे। छात्रों की टोली उनके चरण बन्दन के लिए टूट पड़ी प्रधानाचार्य महोदय क्षत्रिय वर्ग से थे और मैं ब्राहमण कुमार। उस समय कोई भी क्षत्रिय ब्राहमण पुत्रों पर चरण स्पर्श नही कराता था। उस समय यही परम्परा थी। इसलिए मैने अपने दोनो हाथ जोडकर थोडा सा झुककर प्रमाण किया। मेरी पीठ थपथपाते हुये वे बोले- ‘‘बहुत अच्छा जैसा मैने चाहा मेरी कल्पना से भी काफी आगे निकला। मैने उत्कंठा से पूछा क्या मेरा बी0एड0 में दाखिला हो गया…………..क्या मेरा पढाई का खर्च माफ हो गया……………..और मैस का खर्च मेरा वाक्य पूरा भी नही हो पाया था कि मेरी बात को काटते हुये वे बोले क्या तुम खाना नही खाते हो क्या तुमसे मैस के पैसे किसी ने मांगे क्या किताब कापी के पैसे किसी ने मांगे क्या कोई क्लर्क फीस मांगने आया मैं आश्वस्त हो गया कि मेरा दाखिला हो चुका है और मेरे ऊपर खर्च होने वाला रूपया भी स्कूल उठायेगा। मैं दिन में तो कालिज में गणित पढ़ाता और रात को बी0एड0 की पढाई करता रात को कमरे में बल्व जलाकर पढ़ता तो रूम मेट इसका विरोध करते और कहते कि बल्ब के उजाले में हमारी नींद में खलल पड़ती है। मुझे अपने पदने का स्थान बदलना पड़ गया अब में रात को बरामदे में कुर्सी मेज डालकर पढाई करता पढ़ने और पढ़ाने का काम सुचारू रूप से अग्रसरित रहा पड़ते ओर पढ़ाते कई महीने बीत गये एक दिन इण्टर कालिज के छात्रों का शोकावकाश हो गया। कक्षाओं को पढ़ाने वाले अध्यापकों और छात्रों की छुट्टी हो गयी। मुझे अपनी तैयारी करने का मौका मिल गया। मैं पढ़ रहा था कि एक लड़का मुझे कम्यूनिटीवर्क के लिए बुलाने आया। मैं उस जगह गया जहां मेरी कक्षा के बालक कम्यूनिटीवर्क का काम कर रहे थे। इंचार्ज ने कड़कते हुये कहा प्रोफेसर आज तुझे मालूम पड़़ जायेगा कि टेªंिनंग कैसी होती है? तेरा प्रोफेसरपन आज अच्छी तरह निकाल दूंगा। बोल चाल में असम्य इंचार्ज के यहां शालीनता खोजना इस कदर मुश्किल था जैसे पानी के अन्दर मगरमच्छ के जवडों में फसे जीवित प्राणी को बचाना और उसको जीवन दिलाना। उसने आदेश दिया यह फावडा उठा और इतने बीच की जमीन को खोद। मैने फावडा उठाया और जैसे ही धरती में फावडा मारा फावडा उछलकर मेरे सिर से टकराया। असल में फावडे की मँूद में फाल का हिस्सा फटा हुआ था। वह फावडा इंचार्ज ने मेरे लिए ही छोड रखा था और जो मेरे लिए जगह छोड रखी थी वह भी पथरीली थी। मैने इंचार्ज से दूसरा फावडा देने को कहा। इस पर वह वरस पडे बोले या तो तू ही यहां से टेªनिंग करके जायेगा या मैं ही पढ़़ा पाउंगा। इस स्कूल में एक ही रहेगा और मैं तुझे ट्रेनिग नही करने दूंगा मैने और विनम्र होकर कहा ऐसा मत कहो सर मुझे दूसरा फावडा दिला दो। अब तो उन्होने सीमा ही पार कर दी। मेरा गिरेवान पकडकर इतनी जोर से झझकोर ड़ाला कि अगर मेरे हाथ में उनकी कमीज का छोर न पडता तो मैं बुूरी तरह गिर पडता। अब तो वे और भी जोर-जोर से चीखकर चिल्ला पडे हरामखोर! मेरा गिरेवान पकडता है अब में एक भी पल तुझे इस कालिज मे नही रहने दूंगा बच्चो जाओ कमरे में से इसकी खाट कपड़े, किताब, कापी सबको फेक दो बच्चे भी तैयार थे क्यांेकि मै उनके साथ कक्षा में नही रहता था इसलिए वह कटे-कटे से रहते थे। मै वडा परेशान हो गया बच्चे मेरी खाट कपडे और सामान को फेंकने चले गये में दुखी होकर प्रिसिपल साहब के आफिस मे ंचला गया और पूरी बात बता दी। इस बात को सुनकर प्रिसिपल साहब मुझपर बड़े नाराज हुये बोले। तू वहां क्यों गय? तुझे पढ़़ना और पढ़़ाना नही है? तू कम्यूनिटी वर्क के लिए है? उन्होने वहां पर पड़ी एक बेंच पर मुझसे बैठने को कहा। मैं सिर नीचा करके बैंच पर बैठ गया। उन्होने घण्टी बजाई। चपरासी आया, चपरासी से कहा इंचार्ज को बुला ला। चपरासी इंचार्ज को बुला कर लाया। वह कालिज दवंग लोगों का था उनकी भाषा असंयत थी। वे आपस में गाली गलौच देकर बात करते थे। अध्यापक छात्रों से भी ऐसी ही भाषा का प्रयोग करते थे। इंचार्ज के आते ही प्रिसिपल साहब ने उन्हें धमकाना शुरू कर दिया। हरामखोर! तू बाज आयेगा या नही? तू इसे बच्चा समझ रहा है? यह तुझसे केवल एक साल ही छोटा होगा। तुझसे कम पढा नही है। तू थर्ड क्लास है। और यह थ्रो आउट फस्ट डिविजन। तू इसके मुकावले कहीं तो स्टैण्ड नही करता। इस पर भी यह हमारे कितने काम निकाल रहा है। बीच सत्र में हम कहां से अध्यापक लायें। तूने इसे क्यों बुलाया? कम्यूनिटी वर्क इसके बिना पूरा नही हो सकता। ध्यान रखना यदि तुने फिर कोई गलती की तो तुझे में टर्मिनेट कर दूंगा। मैनेजर भी तुझसे प्रसन्न नही है। प्रिसिपल साहब पचास वर्ष से ऊपर की उम्र के काफी अनुभवी शिष्ट आदमी थे। इंचार्ज सिर झुकाऐं लौट आया। मेरे ही सामने उसका अपमान हुआ था इसलिए वह और भी अधिक उदास था। मनुष्य अपने कर्मो के अधीन सुख और दुख का अनुभव करता है। मैं भी सिर झुकाऐं आफिस से बाहर आ गया। समय का पहिया निर्वाध गति से आगे वढ़ता गया और मेरी पढ्ऱाई निरन्तर चलती रही। आखिर वह दिन भी आ गया जिसके लिए छात्र और छात्रायें विद्यालय में प्रवेश लेते है अर्थात परीक्षायें सन्निकट आ गयी।परीक्षाओं से एक महीने पहले प्रैक्टिकल होने थे। सबसे पहले शिक्षण का पै्रक्टिकल था उसकी भी डेट आ गयी। सही टाईम पर वाहर से परीक्षक भी आ गये। सभी शिक्षणार्थी कमरों से बाहर पेड़ की छाया में बैठाये गये। इंचार्ज और एग्जामिनर भी वहां कुर्सी और मेजों पर बैठे थे। इंचार्ज ने मेरी ओर इशारा करते हुये एग्जामिनर से कहा- सर यह पूरे विद्यालय का सबसे उदण्ड सिरफिरा आतंकी लड़का है। इसको बत्तीस नम्बर से अधिक नम्बर नही मिलने चाहिए। प्रैक्टिकल सौ अंको का था। लगता था इंचार्ज और एग्जामिनर में गहन घनिष्ठता हो गयी थी। इंचार्ज मेरी ओर मुखरित होते हुये बोले आज देखता हूँ तू कैसे मेरे रहते हुये टेªनिंग में पास होता है? मेरा कलेजा धक से रह गया। उसने मुझे घूर-घूर कर कई बार ऐसे देखा जैसे कसाई हलाल करने से पहले बकरे को देखता है। मेरी स्थिति इस समय हलाल होने वाले थर थराते बकरे जैसी थी। मैं घबडा गया। अब मैं किससे कहूं और कहां जाऊं? आखिर वहां से उठकर मैं प्रधानाचार्य के आफिस में गया और सभी बात बताई। प्रधानाचार्य कुछ काम कर रहे थे। मेज से ऊपर सिर उठाते हुये मुस्कुराते हुये बोले बेटे तू घबरा मत तसल्ली से टीचिंग का पै्रक्टिकल दें कालिज के पढ़़ने वाले सभी कक्षाओं के बच्चे तेरा वडा सम्मान करते है। जब इंचार्ज प्रैक्टिकल के बाद अंको की लिस्ट बनाकर लाये तो तू पीछे पीछे आफिस में आ जाना। सभी छात्रों को कक्षा और विषय बांट दिये। आज मैं भी सफेद कुर्ता पाजामा और टोपी पहने कक्षा में पढ़़ाने गया। सभी बच्चे मुझे इस गणवेश में देखकर हैरान रह गये। उन्हें आज मालूम पड़ा कि मैं उस कालिज का अध्यापक नही बल्कि अन्य ट्रेनिग करने वालों के साथ का ही टेªनीज हूँ। वे मुझसे वडे प्रभावित हुये। एक लडका मेरे पास आया और मेरे कान में बोला सर यह लगता तो नही है कि आप नया मास्टर बनने जा रहे हो। आपकी पढ़ाई को देखकर तो लगता है आप कितने वर्षो से पढ़ा रहे होगें। मैने मुस्कुरा दिया। छात्र अपनी जगह शान्ति से बैठ गये। इंचार्ज और एग्जामिनर दूसरे दरवाजे से प्रवेश करके बच्चों के पीछे पडी कुर्सी और मेज पर बैठ गये। वहां पहले से ही मैने अपनी शिक्षक डायरी रख दी थी। बच्चे मेरा साथ दे रहे थे। प्रधानाचार्य मेरे कमरे के सामने बरामदे में इधर से उधर चक्कर लगा रहे थे। उन्हें भय था कि यह इंचार्ज कुछ गडवड़ी ना कर दें। एक घण्टा समाप्त हुया। मेरा टीचिंग प्रैक्टिकल वहुत अच्छा रहा अन्य लोगों का प्रैक्टिकल होने वाला था। मुझसे हमदर्दी रखने वाले मेरे पास आये बोले शर्मा जी हमारी कक्षा के छात्र हुरदंग मचाने वाले है उन्हें समझा आना। मैनें उन्हें आश्वस्त किया और उनकी कक्षा में जाकर बच्चों को समझा दिया। टीचिंग के बाद एग्जामिनर और इंचार्ज का नाश्ता पानी हुआ और अंको की लिस्ट बनाई। जब इंचार्ज लिस्ट को लेकर प्रधानाचार्य आफिस की तरफ गये तो चुपके से मैं पहले ही आफिस में घुस गया प्रिसिपल साहब ने मुझे बैंच पर बैठने का आदेश दिया। इंचार्ज ने आफिस में घुसकर मार्कसीट की लिस्ट उनके हस्ताक्षर के लिए दी। प्रधानाचार्य साहब ने लिस्ट हाथ मे ंलेकर पूछा- इस लडके के सबसे अधिक नम्बर दिये या नही। इंचार्ज मौन थे। प्रधानाचार्य ने जब मेरे अंक देखे तो सौ में से केवल 32 अंक थे। प्रधानाचार्य महोदय का पारा चढ़ गया। तू बाकई बहुत वड़ा कमीना है तेरा इंतजाम करना ही पडेगा और उन्होनें कलम से पूरी लिस्ट को क्राॅस कर दिया और क्रोध में बोले जा इस लडके के सबसे अधिक अंक चढ़ाकर ला। मुझसे उसी बैंच पर बैठे रहने का इशारा किया और अपने काम में लग गये। मैं वहीं बैठा रहा। लगभग आध पौन घण्टे बाद वे दूसरी लिस्ट बनाकर लाये। प्रधानाचार्य ने देखा उसमे मेरे 52 अंक ही थे। प्रधानाचार्य ने उस लिस्ट को भी क्राॅस कर दिया और तीसरीलिस्ट बनाने के लिए कहा। आखिर तीसरी लिस्ट भी बनकर आ गयी। उसमें मेरे पिच्चासी अंक थे। आठ दस बालकों के मुझसे अधिक 92 और 95 तक थे। प्रधानाचार्य ने मुझे मेज के पास बुलाया बोलें बेटे यह वडा कमीना है। जो अंक तुझे मिलने चाहिए थे वे अंक फिसड्डी बालको को दे दिये, यदि तू कहे तो मैं चैथी लिस्ट बनवाऊँ। मैनें हाथ जोडकर कहा साहब ये भी काफी अंक है। मेरी स्वीकृति पाकर प्रधानाचार्य ने लिस्ट पर हस्ताक्षर कर दिये ओर उस पर मोहर भी लगवा दी। इस तरह मेरा टीचिंग पै्रक्टिकल हो गया जिसमें केवल मुझे अपने अंकों का पता था और किसी को नही। कक्षा- दस के बोर्ड के पेपर हुये। बच्चों की तैयारी अच्छी थी वे मेरे बडे़ अहसान मन्द थे। अन्य विषय हिन्दी भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान में भी समय-समय पर मैं उनकी मदद करता रहा था इसलिए भी उनके पेपर बहुत अच्छे हुये। लिेखित परीक्षा की मेरी भी अच्छी तैयारी थी मेरी लिखित परीक्षा भी हो गयी। मेरा गांव इस कालिज से करीब 70-72 किलोमीटर दूर था। कक्षा दस के छात्र सब अपने-अपने गांव चले गये। रिजल्ट आने पर सभी बच्चे मुझसे एक बार मिलना चाहते थे। मैं भी अपने गांव आ गया। मई-जून के महीने में जगह जगह कालिजों में इन्टरव्यू देता रहा और अपने गांव से 20-21 किलोंमीटर की दूरी पर जो उस कालिज से जिसमें मैने टैªनिंग की थी उसके विपरीत दिशा में था, मेरी गणित अध्यापक के रूप मे नियुक्ति हो गयी। अब दोनों कालिजों मेे 95-100 किलोमीटर की दूरी थी। पहले कालिज आठ जुलाई को ख्ुाला करते थे। मैने आठ जुलाई से कालिज ज्वाईन कर लिया और वहां पर भी उसी तरह मेहनत से पढ़़ाना शुरू कर दिया जैसे ट्रैनिंग के समय उस काॅलिज में पढ़ाकर आया था। मैं कर्म को ही अपनी पूजा समझता था। इस नये कालिज के बच्चे भी मुझे उसी तरह प्यार करने लगे। इस नये कालिज में पढ़़ाते-पढ़़ाते मुझे लगभग एक सवा महीना हो गया। वरिष्ट लिपिक ने एपरूवल के लिए टेªनिग के कागजात मांगे। रिजल्ट आ गया होगा मैं यह सोच ही रहा था कि मेरे घर के पते पर डाक से टेªनिंग वाले कालिज के प्रधानाचार्य जी का पत्र आया लिखा था- ‘‘प्रिय पुत्र-शुभाशीर्वाद। यूपी बोर्ड हाईस्कूल का रिजल्ट आ गया है तुम्हारे अथक प्रयास से अस्सी प्रतिशत विद्यार्थियों की डिक्टैशन आई है हमारे विद्यालय के छात्र ने गणित में यूपी को टाॅप किया है और कई छात्रों के उसी तरह के नम्बर है। विद्यालय के छात्र एक बार तुमसे मिलना चाहते है। तुम्हारे टेªनिंग की मार्कसीट और सटिफिकेट भी आ चुकी है। एक बार आकर 10 सितम्बर को बच्चों से मिल लो और अपने कागजात भी ले जाओ – तुम्हारा शुभेछु प्रधानाचार्य का नाम’’। पत्र को पाकर मुझे ऐसी प्रसन्नता हुई जैसे किसी रंक को पारस मणि मिल गयी हो। दस सितम्बर को ही मैं उस कालिज के लिए चल दिया। कई माह बाद मैं अपने उन भाई जैसे प्यारे छात्रों से मिलने जा रहा था मेरा मन खुशी के मारे बल्लियों उछल रहा था इसके लिए मुझे तीन बस बदलनी थी मिलने का इंतजार भारी पड़ रहा था। कालिज सड़क के ही किनारे था काफी प्रतीक्षा के बाद कालिज आ ही गया। मैं बस से उतरा और कालिज के अन्दर गया तो वहां उत्सव जैसा माहौल था। स्टेज सजा हुआ था और प्रधानाचार्य, छात्र व शिक्षकगण मेरा इंजतार कर रहे थे। मुझे देखते ही उनमें हर्षातिरेक स्पन्दन का संचार हो उठा। सभी कह उठे आ गये, आ गये……….। मैं उनकी ओर वढ़़ा। सबने मेरा हार्दिक स्वागत किया। प्रधानाचार्य मंच पर कह रहे थे जिनकी वजह से हमारे विद्यालय का रिजल्ट इतना अच्छा रहा है, वे आ गये है। छात्र मुझे देखते ही बहुत खुश थे। ऐसा लगता था कि उन्हें न जाने कुबेर का कौन सा कोष मिल गया हो। मैं भी बहुत खुश था। आपसी बातचीत के बाद प्रधानाचार्य जी ने मुझे स्टेज पर बुलाया। मैनें स्टेज पर कहा ‘‘पिता तुल्य कालिज के प्रधानाचार्य महोदय जी मेरे प्यारे साथियों, प्यारे विद्यार्थियों, मैंने इस कालिज में ऐसा कुछ नही किया जो मेरा ऐसा आदर सत्कार किया जा रहा है। प्रत्युत्तर कालिज और कालिज के प्रधानाचार्य साथियों और कालिज ने मुझे ऐसा सब कुछ दिया है जिससे मेरी जिन्दगी बदल गयी। मैं कालिज की एक-एक ईट यहां के छात्र छात्राओ का अपने भाई शिक्षकों का पूरा आभारी हूँ जिनके सहयोग से मेरी टेªनिंग सफल हुई। मैं किन शब्दों से आप सबका आभार व्यक्त करूं। वे शब्द मुझे मिल नही पा रहे है कि मुझ जैसे अकिंचन को बिना पैसा खर्च किये टेªनिंग दिला दी। यह कहते मेरा गला भर्रा गया और उन मोतियों को मैनंे अपनी आंखो में इधर से उधर छिपाये रखने की कोशिश की पर आखिर वे अपना स्थान छोडकर बाहर आ ही गये। छात्रों ने एक चमकीले बडे पैकिट में एक गिफ्ट लाकर देने को कहा। मैनें कहा मैं इस योग्य नही हूँ। तुम मुझे लज्जित मत करो। पर बालक मानने वाले कहां थे। प्रधानाचार्य के इशारे से वह मुझे लेना पड़ा मैनंे पूछा आखिर इसमें है क्या? परन्तु सभी बालकों ने कहा हमारे दिल की एक तुक्ष भेट। बाद में पता चला उसमें फिलिप्स का एक ट्रांजिस्टर था। ट्रांजिस्टर तो मुझे अपनी शादी में भी नही मिला था। मुझे वड्ऱा दुःख हुआ बच्चों ने कैसे पैसे जुटाये होगें। प्रधानाचार्य बोले चिन्ता मत करों इसमें कालिज का भी कुछ अंशदान है। सभी मुझसे मिलकर प्रसन्न थे और हाथ मिला रहे थे परन्तु मेरे स्वागत पर एक शख्स बडे शर्माये, नीचे गर्दन झुकाये उदास मन से खडे थे और वे थे – इंचार्ज साहब। मैं उनकी ओर वढ़ा और उनका हाथ पकडकर बोला यार क्या तुम मुझसे हाथ नही मिलाओगें? फिर क्या था शैलाव जोरो से फूट पड़ा और तेजी से मुझसे लिपट गये बोले- यार माफ नही करोगें क्या? मै वड़ा शर्मिन्दा हूँ अरे! ये क्या माफी तो तुमसे मुझे मांगनी चाहिए। तुम मुझसे चाहे एक वर्ष ही सही वडे़ तो हो ही। इस तरह मन का गुबार निकल गया। सबको पता चल गया था कि मेरी नियुक्ति एक इण्टर कालिज में हो चुकी हैं। इस प्रकार छात्रों को आशीर्वाद देकर अपने शिक्षकों से मिलकर तथा प्रधानाचार्य जी से आशीर्वाद पाकर, ट्रांजिस्टर को बगल में दवाये तथा टेªनिंग की सर्टिफिकेट लेकर बस में बैठ गया।

लेखक हीरालाल शर्मा, मंगरौली रोड, जेवर

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