अलीगढ़, 1 दिसंबरः अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन कालेज आफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलाजी के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के डा मोहम्मद तारिक के नए आविष्कारों के साथ इंटेलीजेंट हरित प्रौद्योगिकियों और सतत भविष्य के लिए वैज्ञानिकों की खोज एक निष्कर्षपूर्ण प्रौद्योगिकी के करीब पहुंच रही है।
उनके इनोवेशन, ‘एन आटोमेटेड क्लीनिंग सिस्टम आफ द सोलर पीवी पैनल‘ और ‘सन ट्रैकिंग मेकानिज्म विद एन इंटरनेट आफ थिंग्स (आईओटी) बेस्ड आटोमेटेड मूवेबल प्लेटफार्म’ को हाल ही में पेटेंट आफिस, कामनवेल्थ आफ आस्ट्रेलिया द्वारा पेटेंट कराया गया है तथा ऊर्जा के भविष्य के स्रोतों पर काम कर रहे शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों का इस ओर ध्यान आकर्षित हो रहा है।
डा तारिक ने कहा कि सौर पीवी पैनल की स्वचालित सफाई प्रणाली उन स्थानों के लिए डिज़ाइन की गई है जहां चारों ओर धुंध, धूल, गंदगी और रेत उड़ती है तथा ये प्रणाली सिस्टम पैनल पर सभी गंदगी को हटाने में सफल है-जिससे अधिक कुशल और विश्वसनीय आउटपुट प्राप्त होता है।
उन्होंने आगे कहा कि आईओटी आधारित आटोमेटेड मूवेबल प्लेटफार्म के साथ सन ट्रैकिंग मैकेनिज्म न केवल ऊर्जा कैप्चर की क्षमता को बढ़ाएगा बल्कि अधिकतम बिजली उत्पादन के लिए आईओटी-आधारित स्वचालित मूवेबल प्लेटफार्म के साथ समग्र बिजली उत्पादन प्रक्रिया की दक्षता को भी बढ़ावा देगा। उन्होंने कहा कि इस आविष्कार का उद्देश्य जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करना और विद्युत शक्ति के उत्पादन के लिए नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना है।
डा तारिक ने बताया कि इस अविष्कार से सौर पैनलों की सफाई के लिए अतिरिक्त जनशक्ति या रोबोट सिस्टम के उपयोग को कम करके सौर पीवी पैनल की स्वचालित सफाई प्रणाली से परिचालन लागत में भी कमी आएगी।
उन्होंने जोर देकर कहा कि यह आविष्कार लचीले और कुशल सौर पीवी सिस्टम को सपोर्ट करने में सहायक होंगे और अक्षय ऊर्जा स्रोतों के विकास और उनको अपनाये जाने कि सम्भावना को बढ़ाएंगे।
यह अविष्कार डा तारिक ने अपनी छात्रा अलीना नाज़, जो इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बी.ई पूरा करने के बाद अपना अंतिम वर्ष का प्रोजेक्ट कर रही हैं, तथा रिसर्च इंटर्न / प्रोग्रामर, मोहम्मद आज़म के साथ मिलकर किया है।
डा. तारिक, न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय, कैनबरा के साथ दो अंतर-विश्वविद्यालय सहयोगी अनुसंधान परियोजनाओं में प्रमुख अन्वेषक भी हैं, जो यू एन एस डब्ल्यू, आस्ट्रेलिया के एक सहयोगात्मक अनुसंधान अनुदान योजना के तहत वित्त पोषित हैं।








