Google search engine
Friday, March 1, 2024
Google search engine
Google search engine

‘कि अकबर नाम लेता है ख़ुदा का इस ज़माने में’

कलीमुल हफ़ीज़ आर्टिकल के लेखक।

(उमर गौतम के बाद मौलाना कलीम सिद्दीक़ी की गिरफ़्तारी, यानी भारत बहुसंख्यकवाद की तरफ़ तेज़ी से जा रहा है)

जब ज़ुल्म अपने चरम को पहुँचता है तो ख़ुदा की ताक़त को ललकारने लगता है। नमरूद, फ़िरऔन, हामान, शद्दाद, अबू-लहब और अबू-जहल से लेकर आज तक सबका यही हाल रहा है, अल्लाह का नाम लेनेवालों और उसका पैग़ाम आम करनेवालों पर ज़िन्दगी को तंग करनेवाले असल में ख़ुदा के पैग़ाम की आफ़ाक़ियत (सार्वभौमिकता) और सच्चाई से ख़ौफ़ खाते हैं। लेकिन उन्हें ये भी जानना चाहिये कि ख़ुदा का पैग़ाम ग़ालिब होकर ही रहा है और हर ज़माने के फ़िरऔन को हार का मुँह देखना पड़ा है। जैसा कि हम अदालतों के ज़रिए दस, पन्द्रह साल जेल में तकलीफ़ें सहने के बाद बाइज़्ज़त रिहा होनेवालों को देख रहे हैं, यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट को अक्षरधाम केस में कहना पड़ा कि बेगुनाहों को पुलिस के ज़रिए परेशान किया जा रहा है।

ख़ुदा का नाम लेना इन्सान का बुनियादी हक़ है। बीजेपी के सत्ता में आने के बाद ही ये एहसास हो गया था कि भारत में मज़हब के बारे में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन होने वाला है। धर्मान्तरण क़ानून में संशोधन हिन्दुत्वा के झण्डावाहकों के उस पक्के इरादे का ऐलान था कि अब भारत में इन्सानों को अपनी पसन्द का मज़हब क़बूल करने की आज़ादी नहीं रहेगी। भारतीय जनता पार्टी वाले राज्यों में अलग-अलग नामों से विधान सभाओं में बिल लाए गए, मंज़ूर हुए, जहाँ मंज़ूर न हो सके वहाँ ऑर्डिनेंस लाया गया और मज़हब को बदलने ख़ास तौर पर इस्लाम और ईसाइयत को क़बूल करने पर रोक लगाई गई।

धर्मान्तरण के विरोध का यह सिलसिला संघ की बुनियादी पॉलिसी का हिस्सा है। जब वो सत्ता में नहीं थे तब भी वो इसके ख़िलाफ़ थे, ‘लव जिहाद’ के नाम पर हंगामा किया करते थे। लेकिन उस वक़्त वो क़ानून नहीं बना सकते थे। अब वो क़ानून भी बना रहे हैं और उस क़ानून को हर तरह से लागू भी कर रहे हैं। कलीम सिद्दीक़ी साहब हों या उमर गौतम हों, ये लोग इस्लाम की तब्लीग़ करते हैं, इसमें कोई शक नहीं है। ये उनका संवैधानिक अधिकार है। लेकिन किसी को ज़बरदस्ती या लालच देकर या डरा-धमकाकर इस्लाम क़बूल कराने का इलज़ाम इसलिये ग़लत है कि इन दोनों लोगों को ये अच्छी तरह मालूम है कि ऐसा करने से अल्लाह नाराज़ हो जाएगा। यानी जिस ख़ुदा का वो कलिमा पढ़वाएँ वही नहीं चाहता कि कोई लालच या डर से उसका कलिमा पढ़े। न ऐसे इस्लाम क़बूल करनेवालों का कोई फ़ायदा है, न करानेवालों का, बल्कि वो ख़ुदा और क़ानून दोनों की नज़र में मुजरिम हैं।

सवाल ये है कि आरएसएस और उसके साथी संगठन ऐसा क्यों कर रहे हैं? कुछ लोग इसे एक चुनावी हथकण्डा कह रहे हैं। उनके नज़दीक क्योंकि योगी सरकार ने विकास का कोई काम नहीं किया है और किसान आन्दोलन की वजह से उसका वोट बैंक खिसक रहा है, इसलिये वो हिन्दुओं को पोलाराइज़ करने के लिये ऐसा कर रहे हैं। यह भी एक कारण हो सकता है, मगर इसकी बुनियादी वजह संघ की वो पॉलिसी और प्रोग्राम है जिसमें इस देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने का टारगेट है।

संघ का मानना है कि ये देश हिन्दुओं का है, यहाँ मुसलमान हमलावर के तौर पर आए थे, उन्होंने यहाँ के निवासियों को लालच और डर से मुसलमान बनाया था और राज किया था। उसके बाद यही अमल ईसाइयों ने किया। इसलिये संघ चाहता है कि अब इस देश को हिन्दू राष्ट्र बनना चाहिये, जहाँ मनु-स्मृति का क़ानून होगा, जिसके मुताबिक़ दलितों और शूद्रों की ज़िन्दगी जानवरों से भी बदतर हो जाएगी। मुसलमानों के बारे में उनका ये बयान कोई ढका-छिपा नहीं है। अभी कुछ महीने पहले ही संघ के सर-संघ चालक मोहन भागवत ने कहा था कि हिन्दुओं और मुसलमानों का डीएनए एक ही है। ये बुनियादी वजह है इस्लाम की तब्लीग़ और प्रचार-प्रसार करनेवालों की गिरफ़्तारी की।

संघ की बुनियाद रखे जाने और उसके सभी प्रोग्रामों का केन्द्रीय विषय ही ये है कि यह देश हिन्दू राष्ट्र है। इसी को वो प्राचीन सभ्यता, राम-राज्य, राष्ट्र भक्ति, हिन्दुत्वा वग़ैरा कई नामों से पेश करते हैं। उनका पूरा तालीमी सिस्टम इसी के आस-पास घूमता है। उनका सारा लिट्रेचर इसी पर आधारित है। उन्होंने इस काम के लिये सौ से ज़्यादा संगठन बनाए हैं। हज़ारों शाखाएँ और लाखों कारसेवक हैं जो दिन-रात यही काम कर रहे हैं। इसी मक़सद के लिये बाबरी मस्जिद गिराई गई और राम-मन्दिर बनाया गया, इसी के लिये कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किया गया। इसी को सामने रखते हुए धर्मान्तरण बिल लाए गए और इसी बारे में ख़ुदा का नाम लेनेवालों की गिरफ़्तारियाँ हैं। पोलाराइज़ेशन तो उन तमाम सरगर्मियों का दूसरे दर्जे का फ़ायदा है।

दूसरा सवाल ये है कि आख़िर मौजूदा हालात का मुक़ाबला किस तरह किया जाए? मगर माफ़ कीजिये मुक़ाबला तो वो क़ौम कर सकती है जो मुक़ाबले के लिये तैयार हो। यहाँ तो मामला ये है कि क़ौम की अक्सरियत मुक़ाबले के प्रोग्राम और प्लानिंग को ही नहीं जानती है, जो लोग जानते हैं उनमें से ज़्यादातर इसे चुनावी हथकण्डा मान रहे हैं। जो लोग हक़ीक़त जानते हैं और इल्म भी रखते हैं वो आपस में ही झगड़ रहे हैं।

27 सितम्बर के उर्दू अख़बारात उठाकर देखिये इमारते-शरीआ बिहार में कुर्सी को लेकर किस तरह का दंगल है कि जंग रोकने के लिये पुलिस को बीच में आना पड़ा, वो इदारा जो शरीअत की रौशनी में दूसरों के मसले हल करने के लिये बना था आज ख़ुद ही अपने अमीर का चुनाव नहीं कर सकता और ये सिर्फ़ इमारते-शरीआ के लिये ही ख़ास नहीं है आप सब देश की नामी तंज़ीमों और इदारों को जानते हैं कि इनके दो टुकड़े होने के पीछे क्या कारण रहे हैं। जब मिल्लत के रहबर इस हाल को पहुँच चुके हों तो जनता की गिनती क्या करें।

फिर किस तरह हम उम्मीद करें कि संघ की पॉलिसियों और साज़िशों का मुक़ाबला किया जा सकता है। मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो यह कहकर ख़ुद को मुत्मइन कर लेते हैं कि अल्लाह बड़ा कारसाज़ है, वो अकेले ही सब कुछ ठीक कर देगा। अल्लाह की इन ख़ूबियों पर पूरा ईमान रखते हुए मुझे अल्लाह की ये सुन्नत भी मालूम है कि

ख़ुदा ने आज तक उस क़ौम की हालत नहीं बदली।
न हो जिसको ख़याल आप अपनी हालत के बदलने का॥

मैंने मौलाना उमर गौतम की गिरफ़्तारी पर भी लिखा था कि उम्मत का रद्दे-अमल मायूस करनेवाला है और मशवरा दिया था कि मुस्लिम तंज़ीमों के संयुक्त प्लेटफ़ॉर्मों जैसे कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, मुस्लिम मजलिसे-मुशावरत, मिल्ली कौंसिल वग़ैरा के तहत कोई संयुक्त और ठोस स्ट्रेटजी अपनाई जाए। क़ानूनविदों पर आधारित एक लीगल सेल हो जो एक तरफ़ असंवैधानिक गिरफ़्तारियों पर सुप्रीम कोर्ट जाए और दूसरी तरफ़ नरसिंहानन्द जैसे लोगों की गिरफ़्तारियों को यक़ीनी बनाए जो समाज के लिये नासूर हैं।

टीवी चैनलों पर “धर्म का चुनाव इन्सान का मूल अधिकार है” टॉपिक पर डिबेट्स हों, इस काम में दूसरे धर्मों के विद्वानों और बुद्धिजीवियों को साथ लिया जाए। वो लोग जिन्होंने इस्लाम क़बूल किया है और वो बड़े पदों पर हैं उन्हें बाहर लाया जाए, उनके द्वारा प्रेस कॉन्फ़्रेंस कराई जाएँ। हिन्दू संगठनों की शुद्धिकरण तहरीक और घर वापसी के नाम पर ज़ुल्म और ज़्यादती की कारगुज़ारियाँ उजागर की जाएँ। भारतीय सँविधान पर विश्वास रखनेवाली सियासी लीडरशिप को एक किया जाए। उनके द्वारा आवाज़ उठाई जाए। मुझे नहीं मालूम कि मेरी इन गुजारिशों और विनतियों का क्या अंजाम होगा, मगर मैं इतना जानता हूँ कि ये सिलसिला लम्बा होनेवाला है। अभी व्यक्तिगत तौर पर दावत का काम करनेवालों को जेल में डाला जा रहा है उसके बाद तंज़ीमों और अंजुमनों का नम्बर आ सकता है।

मेरे दोस्तो! ये वक़्त आपस में लड़ने और इलज़ाम लगाने का नहीं है। ये वक़्त किसी के मसलक और तरीक़े-कार पर तनक़ीद और कटाक्ष करने का नहीं है बल्कि ये वक़्त ख़ुद अपना हिसाब लेने का है। ये तय करने का वक़्त है कि हम अपने पतन को किस तरह रोकें? अपनी सलाहियतों से किस तरह क़ौम और मुल्क को फ़ायदा पहुँचाएँ? जो मशवरे मैंने पेश किये हैं, बुद्धिजीवियों से इनपर तवज्जोह करने की गुज़ारिश है। क़ानून का मुक़ाबला क़ानून से ही किया जा सकता है। उम्मत के आलिमों की गिरफ़्तारियाँ ग़ैर-क़ानूनी हैं मगर उनकी रिहाई केवल प्रेस रिलीज़ जारी करके नहीं हो सकती।

रक़ीबों ने रपट लिखवाई है जा जा के थाने में।

कि अकबर नाम लेता है ख़ुदा का इस ज़माने में॥

कलीमुल हफ़ीज़, नई दिल्ली

ये लेखक के अपने विचार हैं।

Get in Touch

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Google search engine

Related Articles

Google search engine

Latest Posts